
नीलकंठ — वह रात जब महादेव ने विष पी लिया
अनंत काल में देवों और असुरों ने ठीक एक बात पर सहमति बनाई थी: वे साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करेंगे और जो निकलेगा, बाँट लेंगे। मंदराचल मथानी बना, वासुकि नाग नेती बने, और स्वयं विष्णु ने कच्छप रूप धारण कर पर्वत को अपनी पीठ पर थाम लिया।
युगों तक रस्सी खिंचती रही — प्रतीक्षा थी अमृत की।
सबसे पहले निकली मृत्यु
किसी रत्न से पहले सागर ने उगल दिया हलाहल — ऐसा विष जिसकी केवल भाप से आकाश मुरझाने लगा। वह किसी एक राज्य या एक लोक का संकट नहीं था। वह हर उस वस्तु का संकट था जो कभी रची गई थी। आदिकाल के शत्रु देव और असुर, उस दिन पहली और अंतिम बार एक ही दिशा में भागे।
अब पूछने को केवल वही शेष था, जिसे अंत से कभी भय नहीं लगा।
वह प्याला जिसे कोई और थाम न सका
महादेव ने विष को अपनी हथेली में समेटा और पी लिया। न कोई घोषित बलिदान, न कोई सौदा — बस इसलिए कि सृष्टि को कोई ऐसा चाहिए था जो वह थाम सके, जिसे और कुछ नहीं थाम सकता।
देवी पार्वती ने यह देखा और अपना हाथ उनके कंठ पर रख दिया — विष वहीं ठहर गया। वह उस देह में उतर नहीं सकता था जिसमें समस्त ब्रह्मांड समाया है; वह उस संसार में लौट नहीं सकता था जिसे उन्होंने अभी-अभी बचाया था। सो वह वहीं रह गया — जलता हुआ, नीला, थमा हुआ।
और शिव हो गए — नीलकंठ।
वह नीलिमा कभी क्यों नहीं मिटी
वे हलाहल को नष्ट कर सकते थे। वे संहारकर्ता हैं; उन्हें तनिक भी कुछ न लगता। पर उन्होंने उसे धारण किया, और उसका चिह्न अपने कंठ पर सदा के लिए रहने दिया।
यही उस नीलिमा में छिपा उपदेश है। सबसे बड़ी शक्ति संसार से पीड़ा हटा देना नहीं — उसे स्वयं थाम लेना है, ताकि किसी और को न थामनी पड़े। बाद में निकले अमृत की हर बूँद देवताओं की हुई। विष केवल उनका था।
उन्होंने कुछ नहीं माँगा। उन्हें कुछ नहीं मिला। उन्होंने पिया, और लोक चलते रहे।
हर हर महादेव। 🔱
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