
मधुवन — वह वन जो मथुरा से भी पुराना है
वृंदावन को हर तीर्थयात्री जानता है। पर कम ही लोगों को स्मरण है कि ब्रज के बारह महावनों में शास्त्र सबसे पहले मधुवन का नाम लेते हैं — मधु का वन, इतना प्राचीन कि स्वयं मथुरा इसी की मिट्टी से जन्मी।
आज यहाँ चलिए, तो आप एक साथ तीन युगों में चलते हैं।
मधु का वन
अति प्राचीन काल में यह वन मधु नामक महाबली दैत्य का था — नाम जिसका मधु था, पर राज जिसका भय था। उसके पुत्र लवणासुर को विरासत में यह वन मिला, शिव का एक अजेय त्रिशूल मिला — और पिता का आतंक भी।
पर मधुवन की कथा उसके असुरों की कथा नहीं है। यह उनकी कथा है जो यहाँ कुछ बड़ा पाने आए।
वह बालक जो टस-से-मस न हुआ
सत्य युग में पाँच वर्ष के राजकुमार ध्रुव को सौतेली माँ ने पिता की गोद से उतार दिया। आहत बालक ने अपनी माँ से ऐसा राज्य माँगा जो कोई छीन न सके। माँ ने कहा — ऐसा तो केवल भगवान दे सकते हैं। और ध्रुव उन्हीं को खोजने महल से निकल पड़ा।
नारद के परामर्श पर इसी मधुवन में बालक तपस्या में खड़ा हुआ — पहले एक पैर पर, फिर निराहार, फिर श्वास रोककर — ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जाप करते हुए। उसकी निश्चलता ऐसी प्रचंड हुई कि ब्रह्मांड का दम घुटने लगा। विष्णु प्रकट हुए, बालक के कपोल से शंख छुआया, और उसे वह अटल सिंहासन दिया — ध्रुव तारा, जिसके चारों ओर सारा आकाश घूमता है।
असुर और अयोध्या का राजकुमार
त्रेता युग में असुर लवणासुर इसी वन के गढ़ से समूची भूमि को रौंदता रहा। उसका अंत करने आए राम के सबसे छोटे भाई — शत्रुघ्न — वह मौन भाई, जिसे महाकाव्य प्रायः भूल जाते हैं। उन्होंने असुर को उसके अजेय त्रिशूल से दूर घेरा, उसका वध किया, वन को निरापद किया, और उसके किनारे एक दीप्तिमान नगरी बसाई — मधुपुरी, जिसे संसार ने मथुरा कहा।
जिस भाई को सब भूल गए, उसी ने वह नगरी बसाई जहाँ एक दिन स्वयं भगवान जन्म लेने वाले थे।
कृष्ण की गोचर भूमि
और द्वापर युग में वही भगवान नंगे पाँव उस पुराने वन में लौट आए — एक ग्वाले के रूप में। कृष्ण और बलराम मधुवन के कुंजों में गायें चराते, खेलते, कुश्ती लड़ते, और वहीं विश्राम करते जहाँ कभी ध्रुव तप की अग्नि में तपा था।
जिस वन ने कठोरतम तपस्या देखी थी, वह अब सृष्टि की सबसे मीठी, अलमस्त दुपहरियों से गूँजने लगा। शायद यही मधुवन की गूढ़ सीख है: एक ही धरती तप का भार भी उठाती है और लीला का उल्लास भी — और दोनों से पावन होती है।
आज मधुवन मथुरा से चार मील दूर महोली गाँव के पास एक शांत कुंज के रूप में जीवित है। ब्रज चौरासी कोस की यात्रा आज भी यहीं से आरम्भ होती है — उस पहले वन से, जहाँ एक बालक की ज़िद तारों से भी ऊँची चमकी थी।
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